Monday, November 24, 2008

न डरूं अरि सौं जब जाई लरूं...

एक बार फिर नमस्कार... आज किस विषय पर आपसे बातचीत करूं, समझ नहीं पा रहा हूं... चलिए, आज बात करता हूं अपनी पसंदीदा उक्तियों की... शुरू करता हूं सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविन्द सिंह जी के एक सवैये से...

देहि शिवा वर मोहि इहै...
शुभ करमन ते कबहूं न टरूं...
न डरूं अरि सौं जब जाई लरूं...
निसचै कर अपनी जीत करूं...

इन पंक्तियों का अर्थ है - हे शिव, मुझे यही वर (वरदान) दीजिए, कि मैं शुभ कार्यों को करने से कभी पीछे न हटूं, उन्हें कभी न टालूं... जब भी मैं शत्रु से लड़ने जाऊं, मेरे भीतर डर के लिए कोई स्थान न हो, और मुझमें इतना आत्म-विश्वास हो, कि मैं दृढ़ निश्चय के साथ जाकर युद्ध करूं, और जीतकर लौटूं...

ये मेरी पसंदीदा पंक्तियां हैं... लेकिन मैं हमेशा सोचता हूं, कि इनका महत्व भी वही व्यक्ति समझ सकता है, जिसे निडर, दृढ़-निश्चयी होने के महत्व का अंदाज़ा हो, और जिसके भीतर जीत की इच्छा के अतिरिक्त शुभ कार्यों को करने की कामना भी हो...

आज के इस दौर को हम अक्सर मतलबपरस्त लोगों का दौर कहते हैं, और इसी अवगुण के लिए हर वक्त किसी न किसी को कोसते रहते हैं... लेकिन क्या हम ख़ुद निडर हैं... क्या हम अपनी बात को सही और ग़लत के तराजू पर तोलने के बाद गलती को स्वीकार करते हैं, और सही होने पर किसी के सामने भी अपनी बात पर अड़ सकते हैं... नहीं, आमतौर पर ऐसा नहीं होता है... बॉस, पिता, उम्र में बड़े रिश्ते-नातेदार, दोस्त - बहुत-से लोग ऐसे हैं हमारी ज़िंदगी में, जिनकी बात को हम ग़लत होते हुए भी ग़लत नहीं कहते... कभी शर्म की वजह से, कभी लिहाज की वजह से, और कभी डर की वजह से...

देखा जाए तो अगला गुण भी पहले गुण का ही हिस्सा है... क्या हम ख़ुद दृढ़-निश्चयी हैं... क्या हम अपने मन में कोई निश्चय करने के बाद किसी का भी लिहाज न करते हुए उस पर कायम रह पाते हैं... ज़ाहिर है, हम ऐसा भी नहीं कर पाते हैं...

हम हमेशा जीत के लिए काम करते हैं... यानि जीत की इच्छा हम सबमें है, लेकिन क्या हमारे भीतर इतना आत्म-विश्वास भी है, कि हम पहले से तय कर सकें कि हम जीतेंगे ही... शायद नहीं... काम करने के दौरान विरले ही मिलेंगे, जिनके दिल में शंका ने घर न किया हो... हां, और क्या हम हमेशा शुभ कार्यों को करने के लिए लालायित रहते हैं... बिल्कुल नहीं... हम सिर्फ़ वे काम करते हैं, जिनमें हमें अपना लाभ दिखाई देता है...

इसके अलावा मुझे कुछ और पंक्तियां भी बेहद पसंद हैं, जिनका जिक्र मैं यहां करना चाह रहा था, लेकिन अंग्रेज़ी में हैं... फिर सोचा, क्या फर्क पड़ता है भाषा से... सो, पेश हैं...

Wait, your waiting will not be in vain...
Time guilds, with gold, the iron links of pain...
The dark today leads into a light tomorrow...
There is no endless joy, no endless sorrow...

इन पंक्तियों का अर्थ है...
सब्र (शाब्दिक अर्थ है प्रतीक्षा) करो, सब्र करना व्यर्थ न जाएगा...
लोहे की ज़ंजीरों जैसी प्रतीत होती पीड़ा पर समय सोने का मुलम्मा बनकर चढ़ जाएगा, और दुःख हर लेगा...
हर अंधकारमय रात के बाद प्रकाशयुक्त सवेरा ज़रूर आता है...
इसी प्रकार, न कोई खुशी स्थायी होती है... और न ही कोई दुःख...

इन पंक्तियों का जो आशय मुझे समझ में आता है, वह है - धीरज धरो, क्योंकि किसी भी विपत्ति के समय वही बेहतरीन हथियार होता है... धीरज धारण करने से ही आप किसी भी परेशानी को दूर करने के लिए उपाय करने में सक्षम बने रहते हैं, वरना आप विपत्ति से परेशान हो गए, तो स्थिति को सुधारने के लिए कुछ करने योग्य भी नहीं रहते... समय वैसे भी हर दुःख को भुला देता है, वरना हर मरने वाले के बाद उसका परिवार कभी ठीक रह ही नहीं सकता... हमेशा सोचो, हर दुःख बड़ा दुःख है, लेकिन उससे बड़े दुःख भी हैं, जो तुम्हे नहीं मिले... इसी सन्दर्भ में अपने पसंदीदा लेखक के एक उपन्यास में पढ़ी एक पंक्ति याद आ रही है - युद्ध में किसी की टांग कट जाए, बहुत बड़ा दुःख है, लेकिन उसके साथी से बड़ा दुःख नहीं, जिसका सिर कट गया...

सो, जो हो चुका है, उसका अफ़सोस करना छोड़ दो, क्योंकि वह बीत चुका है, जिसे तुम बदल नहीं सकते, लेकिन तुम्हारे अफ़सोस करते हुए एक जगह पड़े रहने से आगे जो बिगड़ सकता है, उसे रोक लो, क्योंकि वह तुम्हारे हाथ में है... उठो, और परिस्थिति को अपने अनुकूल बनाने के लिए प्रयासरत हो जाओ, क्योंकि परिस्थिति के अनुकूल पशु होता है, मनुष्य नहीं...

सो, आज मैं एक बार फिर तय करता हूं कि मैं निडर, दृढ़-निश्चयी रहूंगा, और किसी भी दुःख को अपने भीतर घर नहीं करने दूंगा...

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Thursday, November 13, 2008

दिल्ली की सड़कें, साइकिल की सवारी...

उफ़ ये दिल्ली की सड़कें... गाड़ी पर चलते हुए अचानक आ गया सड़क पर गड्ढा... आप कहते हैं, अरे, यह कल तो नहीं था, रात-रात में कहां से बन गया... लेकिन अब बन गया तो बन गया, क्या कर सकते हैं, लेकिन आपकी गाड़ी का सत्यानाश कर गया... अब इस गड्ढे के लिए भी गाड़ी रोक-रोककर चलानी पड़ेगी... कोई बात नहीं यार, वैसे भी इस बढ़ते ट्रैफिक में ठीक-ठाक रफ़्तार से चलने की सोच ही कौन पाता है...

गाड़ी तो हम नए से नए मॉडल की ले लेते हैं, जिसकी रफ़्तार सबसे तेज़ हो, लेकिन कभी सोचा है - अपनी तेज़ रफ़्तार गाड़ी को इस शहर में कभी उसकी पूरी रफ़्तार से चला पाए हैं... जवाब है - नहीं... और यह एक ऐसा सपना है, जिसके इस जन्म में पूरा होने के आसार भी नहीं हैं, बशर्ते आप किसी गांव में जाकर बस जाएं, या शहर में कर्फ्यू लग जाए, और आपको सड़क पर गाड़ी चलाने की इजाज़त मिल जाए...

सुबह घर से ऑफिस और शाम को ऑफिस से घर आते-जाते रोज़ सोचता हूं, ऑफिस में ही एक कमरा मिल जाए... कम से कम 'तेल बचाओ आन्दोलन' या 'धन बचाओ आन्दोलन' का उम्मीदवार तो बन ही जाऊंगा... दिल्ली के बैंकों के लोन से दबे दिखावापसंद लोगों के हाथ में मनपसंद गाड़ियां तो आ गईं, लेकिन वे कभी सोचने की ज़रूरत महसूस नहीं करते कि कब इन्हे अच्छी रफ़्तार से चला पाएंगे...

इसका इलाज भी शायद हम लोगों के बस का नहीं है... या तो हम कुछ 'सुधर' जाएं और अपनी पसंदीदा गाड़ियों को कुछ आराम देकर सार्वजनिक सेवाओं का इस्तेमाल शुरू कर दें, या पूलिंग करें - यानि एक ही दिशा में जाने वाले मिल-जुलकर चलें, और आपस में बदल-बदलकर गाड़ियां लेकर आएं... मैंने एक दिन तय किया - कोई और करे न करे, मैं तो 'सुधरने' की कोशिश करूंगा... लेकिन पहले ही दिन सपना टूट गया... ऑफिस तो देर से पहुंचा ही, कपड़े भी फटवा बैठा... 60 सवारियों के लिए चलने वाली बस में 120 से ज़्यादा सवारियां लदी हुई थीं, और उससे कहीं ज़्यादा बस स्टैंड पर खड़ी थीं... दिल्ली परिवहन निगम की हरी और लाल बसें देखकर ख़्याल आया, सारी बसें ऐसी ही हो जाएं, और इनकी गिनती बढ़ जाए, तो कितना अच्छा हो, क्योंकि तब शायद मेट्रो और बस को तरजीह मिलनी शुरू हो जाए, इनका इस्तेमाल बढ़ जाए और सड़कों पर से गाड़ियां कुछ कम हो जाएं...

लेकिन दिल्ली की बढ़ती आबादी, और साथ-साथ बढ़ती ट्रैफिक समस्याओं को देखकर हाल ही में पढ़ी एक ख़बर के बाद पड़ोसी चीन को बधाई देने का मन करता है, जिसने एक ख़ास शहर में ट्रैफिक समस्या से निपटने के लिए सार्वजनिक बस सेवा में 20 गुना वृद्धि कर दी, और साथ ही मोटर साइकिल पर लगने वाले टैक्स को 20 गुना बढ़ा दिया... नतीजा - बस सेवा का इस्तेमाल बढ़ गया और दुर्घटनाओं में काफ़ी कमी आई... सरकार को नुकसान तो शर्तिया हुआ, लेकिन जनता का भला हुआ, सड़क सुरक्षा अपने-आप बढ़ गई...

हो सकता है, राष्ट्रमंडल खेलों से पहले दिल्ली में भी सड़क के इन गड्ढों से निजात मिल जाए, नए पुलों और मेट्रो की नई लाइनों के शुरू हो जाने से ट्रैफिक कुछ सुचारु दिखाई देने लगे, नए स्टेडियम, नई इमारतें, नए होटल दिल्ली के सौंदर्य को चार चांद लगा दें, लेकिन दिल्ली की लगातार बढ़ती आबादी को देखकर सबसे पहले महसूस होता है कि यह सिस्टम दोबारा नहीं बिगड़ेगा, इस बात की कोई गारंटी नहीं है, क्योंकि ट्रैफिक जाम के भंवर में फंसी दिल्ली रोज़ एक नए रसातल में धंसती जा रही है...

अब कुछ उपायों पर विचार करें... मेरी समझ कहती है - जिनका काम फ़ोन या कंप्यूटर (इन्टरनेट) से चल जाता है, उन्हें घर से काम करने की अनुमति दी जानी चाहिए... ज़रूरत पड़ने पर ही वे लोग ऑफिस आएं... सभी ऑफिस नौ से पांच या दस से छह चलने के बजाए अलग-अलग समय पर दो-दो घंटे के अन्तर से खुलें और बंद हों, ताकि सड़क पर ट्रैफिक बंट जाए... यह भी ज़रूरी नहीं कि सभी के साप्ताहिक अवकाश शनिवार और रविवार को ही हों... दफ्तर और कर्मचारियों की सहूलियत के हिसाब से उन्हें भी अलग-अलग दिन तय किया जा सकता है...

इसके अलावा जिस तरह स्कूल में दाखिले के लिए तय किए मानदंडों में से एक है, बच्चा स्कूल से तीन किलोमीटर के दायरे में रहता हो, तो प्राथमिकता दी जाती है... ऐसा नौकरी के लिए आवेदन करते समय भी किया जा सकता है... उसकी शैक्षणिक योग्यता और अनुभव के साथ-साथ ज़रूरत हो, तो उसके निवास की दूरी के हिसाब से भी उसे वरीयता दी जा सकती है...

मेरी अपनी सोच कहती है कि इन या इनके जैसी छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखकर हम इस तेज़-रफ़्तार ज़िन्दगी में कुछ रफ़्तार हासिल कर सकते हैं, वरना वे दिन अब ज़्यादा दूर नहीं लगते, जब कार, बस, मेट्रो वगैरह को छोड़कर हम सब पुराने दिनों की तरह साइकिल से सफर किया करेंगे...

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ओ साथी रे... तेरे बिना भी क्या जीना...

आज किशोर होते तो 79 साल के हो गए होते... गायक, संगीत निर्देशक, गीतकार, अभिनेता, निर्माता-निर्देशक किशोर कुमार अब हमारे बीच नहीं हैं, और लगता है कि उनके जाने से बन गया खालीपन आने वाले कई सालों तक भरा नहीं जा सकेगा...

किसी भी फ़िल्म के निर्माण में सभी विधाओं का महत्व होता है, लेकिन बॉलीवुड फिल्मों के संगीत पक्ष की महत्ता हमेशा से बहुत अधिक रही है, सो, फ़िल्म निर्माण के हर पहलू से जुड़े रहे होने के बावजूद किशोर ख़ुद को गायक कहलाना ही पसंद करते थे... हालांकि किशोर के समय में मोहम्मद रफी और मुकेश जैसे नाम भी मौजूद थे, लेकिन भारतीय फ़िल्म संगीत में उनाका नाम अलग ही चमकता रहा...

मध्य प्रदेश के छोटे-से कस्बे खंडवा में 4 अगस्त, 1929 को प्रसिद्ध बैरिस्टर कुंजबिहारी लाल गांगुली के घर में आभास कुमार गांगुली के रूप में जन्मे किशोर बचपन से ही संगीत प्रेमी थे... किशोरावस्था में ही किशोर अपने बड़े भाई कुमुद कुमार गांगुली के पास मुंबई चले आए, जो उस वक्त बॉम्बे टॉकीज़ में लैब एसिस्टेंट के तौर पर तो काम कर ही रहे थे, अशोक कुमार के नाम से ख़ुद को अभिनेता के रूप में भी स्थापित कर चुके थे...

भाई की मदद से जल्द ही किशोर का परिचय कई फिल्मी हस्तियों से हो गया, लेकिन वह निर्देशक शाहिद लतीफ़ थे, जिन्होंने पहली बार किशोर की योग्यता को पहचाना और अपनी फ़िल्म 'जिद्दी' में खेमचंद्र प्रकाश के संगीत निर्देशन में गाने का मौका दिया... कुंदनलाल सहगल के अंदाज़ में गाया गया और देव आनंद पर फिल्माया गया यह गीत 'मरने की दुआएं क्यों मांगूं...' 1948 में शूट किया गया, और ज़ोरदार हिट रहा... इसके बाद देव आनंद के लगभग सभी गीतों में आवाज़ किशोर की ही रही...

अभिनेता बनने का किशोर का असली सपना 1951 में पूरा हुआ, जब उन्हें फ़िल्म 'मुक़द्दर' में एक छोटी-सी भूमिका मिली, लेकिन उन्होंने उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाबी हासिल की... 'छम-छमा-छम' में पहली बार उन्हें नायक की भूमिका मिली, और उसके बाद लगातार वह काम करते गए... उनकी कुछ पसंद की गई फिल्मों में 'आशा', 'बाप रे बाप', 'भाई भाई', 'नई दिल्ली', 'मेमसाब', 'नौकरी', 'हाफ टिकट', 'रंगोली', 'मिस्टर एक्स इन बॉम्बे', 'गंगा की लहरें', 'चाचा जिंदाबाद', 'चलती का नाम गाड़ी', 'झुमरू', 'प्यार किए जा', 'पड़ोसन', 'इल्ज़ाम', 'शरारत', 'नया अंदाज़', 'साधु और शैतान' और 'दिल्ली का ठग' शामिल हैं...

किशोर न सिर्फ़ पर्दे पर बहुत-सी अभिनेत्रियों के नायक बने, बल्कि वह असली जिंदगी में भी चार नायिकाओं के नायक रहे... उनका पहला विवाह रूमा देवी से हुआ, जिनसे उन्हें अमित कुमार के रूप में बड़ा बेटा मिला... कुछ विवादों के बाद दोनों के बीच तलाक हो गया, और उसके बाद किशोर ने आज तक की सबसे खूबसूरत अभिनेत्री कही जाने वाली अभिनेत्री मधुबाला से ब्याह रचाया... यह विवाह भी ज़्यादा नहीं चला, और मधुबाला भगवान को प्यारी हो गई... उसके बाद किशोर ने एक और अभिनेत्री योगिता बाली से शादी की, लेकिन जल्द ही उनमें भी अलगाव हो गया... आख़िर में किशोर ने लीना चंद्रावरकर से शादी की, जिनसे उन्हें छोटा बेटा सुमित कुमार मिला... लेकिन विडम्बना यह रही कि जब सुमित चार साल का था, 13 अक्टूबर, 1987 को किशोर को दिल का दौरा पड़ा, जो घातक साबित हुआ... और वह भी उस दिन, जब बड़े भाई अशोक कुमार अपना जन्मदिन मना रहे थे...

इस हरफनमौला कलाकार ने हमारे फिल्मोद्योग को बहुत कुछ दिया है... न सिर्फ़ अपनी शीरीं आवाज़ से, बल्कि किशोर ने कई फिल्मों का निर्माण-निर्देशन भी किया, अभिनेता वह थे ही, संगीत निर्देशक भी रहे और गीतकार भी... उनकी बनाई फिल्में व्यावसायिक रूप से सफल रही हो या नहीं, संगीत को हमेशा पसंद किया गया... उनके निर्माण-निर्देशन में बनी कुछ फिल्में हैं - 'दूर का राही', 'दूर गगन कि छांव में', 'झुमरू', 'चलती का नाम गाड़ी', 'बढ़ती का नाम दाढ़ी', 'दूर वादियों में कहीं', 'लुकु चोरी' (बांग्ला)... जिस समय उनका देहावसान हुआ, वह 'ममता की छांव में' बनाने में व्यस्त थे...

किशोर हमेशा दिल से गाने वाले गायक के रूप में मशहूर रहे हैं... अपनी फ़िल्म 'झुमरू' में उन्होंने भारतीय श्रोताओं को यॉडलिंग से परिचित कराया, और आज भी उनके अंदाज़ में लय और ताल के साथ तालमेल बिठाते हुए कोई गायक उतनी प्रवीणता के साथ यॉडलिंग का इस्तेमाल नहीं कर पाया... यॉडलिंग के साथ गाए उनके गीतों में 'ज़िंदगी एक सफर...' (अंदाज़), 'मैं हूं झुमरू...' (झुमरू) और 'मैं सितारों का तराना...' (चलती का नाम गाड़ी) आदि काफी मशहूर हुए...

इस तरह के गीतों के चलते किशोर को 'मस्त' गायक ही माना जाने लगा था, लेकिन उसी दौर में राहुल देव बर्मन (पंचम डा) ने अपनी फ़िल्म 'अमर प्रेम' में 'चिंगारी...' गाने का मौका दिया, और किशोर ने साबित करके दिखाया कि वह न सिर्फ़ मस्ती-भरे गाने गा सकते हैं, इसी आवाज़ से दर्द भरे गीतों में इतना दर्द भर सकते हैं कि आंसू छलक आएं... अब किशोर ने दर्द-भरे गीतों में भी लोकप्रियता हासिल की और 'ज़िंदगी का सफर...' (सफर), 'दिल ऐसा...' (अमानुष), 'ज़िंदगी के सफर में...' (आप की कसम), 'जब दर्द नहीं था...' (अनुरोध), 'बड़ी सूनी-सूनी...' (मिली), 'ओ साथी रे...' (मुक़द्दर का सिकंदर), 'मेरे नैना...' (महबूबा) उनके गाए कुछ ऐसे गीत हैं, जो कभी पुराने नहीं हो पाएंगे...

किशोर की आवाज़ की एक विशेषता यह भी थी, कि उसमें उम्र कभी नहीं झलकती थी... वह अंत तक 'आज की आवाज़' बने रहे... यह बात इस तथ्य से भी सिद्ध हो जाती है कि उन्होंने बाप-बेटे की कई जोड़ियों को आवाज़ दी... जब सुनील दत्त नायक थे, किशोर उनके लिए गाते थे, और जब संजय दत्त नायक बना, उनके लिए भी किशोर को ही चुना गया... धर्मेन्द्र-सन्नी देओल, शशि कपूर-कुणाल कपूर, देव आनंद-सुनील आनंद आदि कुछ और ऐसे उदाहरण हैं... 1948 में 'ज़िद्दी' से शुरू होकर 1987 में अपनी मृत्यु से केवल एक दिन पहले फ़िल्म 'वक्त की आवाज़' के मिथुन चक्रवर्ती पर फिल्माए गीत 'गुरु गुरु...' तक के सफर में किशोर बहुत-से सुपरस्टारों की आवाज़ बने रहे, जिनमें राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं...

इन दो के अलावा किशोर ने न सिर्फ संजीव कुमार, बड़े भाई अशोक कुमार, ट्रेजेडी किंग कहे जाने वाले दिलीप कुमार, सुनील दत्त, धर्मेन्द्र, महमूद, प्राण, शशि कपूर, ऋषि कपूर जैसे अभिनेताओं को आवाज़ दी, बल्कि अनिल कपूर, संजय दत्त, चंकी पांडे और सन्नी देओल जैसे कदरन नए अभिनेताओं के गीत भी गाए... यही नहीं, किशोर का एक पुराना रिकॉर्ड किया गीत 'आशिक की है बारात...' 1994 में उनकी मृत्यु के सात साल बाद प्रकाश मेहरा की एक टीवी चैनल के लिए बनाई गई फिल्म 'मिस्टर श्रीमती' में एक बिल्कुल नए अभिनेता ऋतुराज और जावेद जाफरी पर फिल्माया गया... इस गीत के साथ किशोर संभवतः दुनिया के पहले ऐसे गायक हैं, जिनकी मौत के इतने साल बाद उनका कोई गीत किसी फ़िल्म में इस्तेमाल किया गया हो...

वह पैदायशी कलाकार थे... यह तथ्य उस समय साबित हो जाता है, जब आप उनके संगीतबद्ध किए गीतों को सुनते हैं... ख़ुद की बनाई और निर्देशित की हुई फ़िल्म 'दूर का राही' के गीत 'बेकरार दिल तू गाए जा...' का संगीत और फिल्मांकन ही यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि किशोर की योग्यता को सही अभिव्यक्ति कभी-कभार ही मिल पाई... ऐसी सफलता किसी के भी दिमाग पर सवार हो सकती थी, लेकिन किशोर शायद दुनिया के एकमात्र ऐसे पार्श्वगायक हैं, जिन्होंने अभिनय के दौरान ख़ुद के लिए किसी और गायक को इस्तेमाल किया हो... 'रागिनी' में 'मन मोरा बावरा...' और 'शरारत' में 'अजब है दास्तां तेरी यह ज़िंदगी...' किशोर के ऐसे गीत हैं, जिन्हें मोहम्मद रफी ने गाया...

अपने अलावा भी किशोर ने लगभग सभी संगीत निर्देशकों के लिए गाने गाए हैं, और अधिकतर लोकप्रिय हुए... ओंकार प्रसाद नय्यर के लिए 'रूप तेरा ऐसा...' (एक बार मुस्कुरा दो), लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के लिए 'यह जीवन है...' (पिया का घर), मदन मोहन के लिए 'सिमटी-सी शरमाई-सी...' (परवाना), शंकर-जयकिशन के लिए 'गीत गाता हूं मैं...' (लाल पत्थर), रवींद्र जैन के लिए 'घुंघरू की तरह...' (चोर मचाए शोर), सी रामचंद्र के लिए 'चरणदास को...' (पहली झलक), हेमंत कुमार के लिए 'वो शाम कुछ अजीब थी...' (खामोशी) और बप्पी लाहिरी के लिए 'पग घुंघरू बांध...' (नमकहलाल) कुछ अधिक ही याद किए जाते हैं...

संघर्ष और सफलता-असफलता का जो दौर 1948 में 'ज़िद्दी' से शुरू हुआ था, वह 'आराधना' फ़िल्म के साथ 1969 में थम गया... उसके बाद से अपने अन्तिम समय तक किशोर ने पीछे मुड़कर नहीं देखा... इस नए दौर में जो किशोर को हासिल हुआ, वह अकल्पनीय था... कुंदनलाल सहगल और मोहम्मद रफी के बाद वह ऐसे तीसरे गायक थे, जिनके दौर में किसी और गायक के लिए लगभग कोई स्थान नहीं बचा था... इसे साबित करने के लिए यह तथ्य काफ़ी है कि वह एकमात्र ऐसे पुरूष पार्श्वगायक हैं, जिन्हें सबसे लोकप्रिय कहा जाने वाला फ़िल्मफेयर पुरस्कार आठ बार मिला... पहली बार 1969 में 'आराधना' के 'रूप तेरा मस्ताना...' के लिए फ़िल्मफेयर ट्राफी उठाने वाले किशोर ने 1975 में 'दिल ऐसा किसी ने...' (अमानुष), 1978 में 'खइके पान...' (डॉन), 1980 में 'हज़ार राहें...' (थोड़ी-सी बेवफाई), 1982 में 'पग घुंघरू...' (नमकहलाल), 1983 में 'अगर तुम न होते...' (अगर तुम न होते), 1984 में 'मंजिलें अपनी जगह हैं...' (शराबी) और 1985 में 'सागर किनारे...' (सागर) के लिए भी फ़िल्मफेयर पुरस्कार हासिल किया...

किशोर पूरी तरह एक भारतीय गायक रहे... उन्होंने न सिर्फ़ हिन्दी में गाया, बल्कि बांगला, पंजाबी, गुजराती, मराठी, तमिल, तेलुगू और कई अन्य भाषाओं के गीतों को भी आवाज़ दी... अपने करियर के दौरान किशोर ने सैकड़ों चेहरों के लिए लगभग 35,000 फिल्मी और गैर-फिल्मी गाने गाए, लगभग 80 फिल्मो में अभिनय किया, 10 फिल्मो का निर्माण किया, और आठ फिल्मों के लिए संगीत निर्देशन का जिम्मा उठाया...

कैसी भी उम्र के अभिनेता के लिए कैसे भी मूड के गीत को जीवंत बना देने वाले किशोर के बाद आज के नायकों के चेहरों पर सोनू निगम, उदित नारायण, अभिजीत आदि की आवाजें अच्छी भले ही लगती हैं, लेकिन कहीं न कहीं यह एहसास ज़रूर दिलाती हैं कि कहीं न कहीं कुछ खो गया है... 'दूर का राही', 'दूर गगन की छांव में' चला गया है, लेकिन मेरा हिन्दुस्तानी दिल हमेशा कहेगा... 'गाता रहे मेरा दिल...'

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