Wednesday, December 17, 2008

हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तानी बच्चे, और हिन्दी की हालत...

आप और हम जानते हैं कि भारतीय संविधान के अनुसार देश की राजभाषा का दर्जा हिन्दी को हासिल है... वैसे संविधान की आठवीं अनुसूची में अनुच्छेद 344 (1) तथा अनुच्छेद 351 के अंतर्गत कुल 22 भाषाओं को मान्यता दी गई है, परंतु देश के उत्तरी से दक्षिणी छोर तक हमारे देश में शायद 100 या उससे भी अधिक भाषाएं अथवा बोलियां बोली जाती हैं, जिन्हें देश की भाषाएं कहा जा सकता है... लेकिन फिर भी राजभाषा का होना आवश्यक होता है, क्योंकि राजभाषा की अनुपस्थिति में देशवासियों में एकता की भावना का विकास होना बेहद दुरूह होता है... और हां, एक राजभाषा के बिना विविधता से भरे हमारे जैसे देश में सभी देशवासियों का परस्पर संवाद भी संभव नहीं हो सकता...

जैसा कि हमने देखा, हमारे संविधान निर्माताओं ने भी इस आवश्यकता को महसूस किया था, और स्वीकार किया था कि इस देश में हिन्दी ही वह राजभाषा हो सकती है... लेकिन आज़ादी के 61 साल और संविधान के लागू होने के लगभग 58 साल बीत जाने के बावजूद न सिर्फ हिन्दी की तरक्की नहीं हो पाई है, अंग्रेज़ी का प्रभुत्व भी पहले से कुछ बढ़ा ही है... मेरे लिए अंग्रेज़ी का महत्व कम न होना कतई अफ़सोसनाक नहीं, लेकिन हिन्दी को उसका उचित दर्जा न मिलना (कागज़ों पर नहीं, व्यवहार में), और उससे भी ज़्यादा उसकी 'दुर्गति' होना बेहद अफ़सोसनाक है...

सही मायनों में देखें तो इस स्थिति के लिए पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारी मानसिकता में घुसती जा रही अंग्रेज़ियत है, हम पर सैकड़ों साल तक राज करके गए अंग्रेज़ या उनकी भाषा नहीं... आधुनिकता और गला-काट प्रतियोगिता में स्थान सुरक्षित करने के नाम पर हम अगर अपनी अगली पीढ़ी को अंग्रेज़ी सिखाएं तो कोई परेशानी नहीं, लेकिन ऐसा हिन्दी की कीमत पर होगा, तो वह देश का नुकसान है... दरअसल हमें इस बात को समझना होगा कि कोई भी भाषा सिर्फ भाषा नहीं होती, उसे बोलने और व्यवहार में लाने वाले देश की संस्कृति की अध्यापक और परिचायक भी होती है, सो, यदि हमारा बच्चा हिन्दी बोलने और समझने में ही कठिनाई महसूस करेगा, तो शायद उसके लिए भारतीयता और भारतीय गौरव को समझना नामुमकिन न सही, बेहद मुश्किल ज़रूर होगा...

अंग्रेज़ी पढ़ने-लिखने, बोलने और समझने वाले किसी भारतीय को देखना गर्व और खुशी का एहसास कराता है, क्योंकि वह किसी दूसरे देश के व्यक्ति को हमारे देश और उसकी गौरवगाथाओं के बारे में जानकारी देकर प्रभावित कर सकता है, कहीं भी हमारा या हमारे देश का उचित प्रतिनिधित्व कर सकता है... लेकिन कल्पना करें कि यदि ऐसे ही किसी व्यक्ति को अपनी मातृभाषा हिन्दी समझने में कठिनाई होती रही हो, क्योंकि उसे बचपन से स्कूल या घर में हिन्दी बोलने या समझने का अवसर नहीं मिला, तो उसके अंग्रेज़ी के बेहतरीन ज्ञान का देश को क्या लाभ हो सकता है...

आमतौर पर किसी भी देश की गौरवगाथाएं वहीं के निवासियों द्वारा स्थानीय भाषाओं में ही लिखी या कही जाती हैं... सो, यदि मातृभाषा का ही पर्याप्त ज्ञान नहीं होगा, तो किसी के लिए भी देश को समझना क्योंकर मुमकिन है... और हां, एक ज़रूरी बात और - जिस देश को आप समझेंगे ही नहीं, उसके लिए गर्व की अनुभूति क्योंकर आपके दिल में पैदा होगी... सो, यह तो तय है कि देश को समझने के लिए देश की भाषा का अच्छा ज्ञान अनिवार्य है...

अब बात हिन्दी की... सैकड़ों सालों तक ग़ुलामी का दंश झेलते रहे देश में किसी भाषा के लिए बचे रहने का एकमात्र उपाय 'सहिष्णु' हो जाना है, सो, वैसा हिन्दी ने अपने नैसर्गिक गुण के चलते सरलता से कर लिया, और विदेशी भाषाओं के बहुत से शब्दों को ख़ुद में समाहित करती चली गई, और दूसरी ओर समृद्ध भी होती रही... किसी भी भाषा की पहुंच, शक्ति और संपन्नता के लिए वृहद्तर शब्दकोष के अतिरिक्त इस बात का भी समान महत्व होता है कि वह नए शब्दों का निर्माण और अन्य भाषाओं के शब्दों को कितनी तेज़ी से आत्मसात करती है... हिन्दी में ये सभी गुण नैसर्गिक रूप से मौजूद हैं... संस्कृत के अलावा अरबी, फ़ारसी, उर्दू और अंग्रेज़ी के भी न जाने कितने ही लफ्ज़ इस तरह हिन्दी में समा लिए गए हैं, कि आज बहुत से शब्दों में तो एहसास भी नहीं होता कि वे हिन्दी के नहीं हैं, या नहीं थे...

हमारे मुल्क में हिन्दी एक ऐसी भाषा है, जिसे जानने वाले कश्मीर से कन्याकुमारी और कोलकाता से कच्छ तक मिलते हैं... सो, स्वाभाविक है कि हिन्दी ही वह भाषा हो सकती है, जिसमें हम अपने देश को जान पाएंगे... एक स्पष्टीकरण भी देना चाहूंगा - ऐसा नहीं है कि भारत की अन्य भाषाए यह काम नहीं कर रही हैं, या ऐसा करना उनके लिए सम्भव नहीं है, लेकिन यहां मेरा उद्देश्य एक ऐसी भाषा के बारे में बात करने का है, जो सारे देश में पहले से प्रसारित हो, सो, ऐसी भाषा हिन्दी ही हो सकती है...

हिन्दी की मौजूदा स्थिति को हम आज तो निराशाजनक नहीं कह सकते, लेकिन कम से कम बड़े शहरों के अंग्रेज़ी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों से बात करके यह एहसास बहुत तेज़ी से दिल में घर करता है कि शायद निराशाजनक हालात दूर नहीं हैं... जो बच्चा आज उनतालीस, उनचास, उनसठ, उनत्तर और उनासी के बीच फर्क नहीं समझेगा, उसके लिए आने वाले दिनों में आम देशवासियों से बात करना, और देश के गौरव को समझना क्योंकर मुमकिन होगा... सो, आइए, भाषागत राजनीति में उलझे बिना ऐसे काम करें, जिससे हिन्दी और समृद्ध, और सशक्त हो...

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Thursday, December 11, 2008

कब जागेगा इंडिया, एक नई सुबह में...

जब से मुंबई में आतंकवादियों का हमला हुआ है, और आतंकवादियों के तार इस बार भी लगभग हमेशा की तरह पाकिस्तान से ही जुड़े दिखाई दे रहे हैं, हमेशा ही की तरह जनता की तरफ़ से एक ही आवाज़ आती सुनाई दे रही है... अब पाकिस्तान पर हमला हो जाना चाहिए...

भगवान जाने, सरकार को कैसा लग रहा है... लेकिन इस बार जनता की इस इच्छा में पहले के मुकाबले कहीं ज़्यादा मजबूती नज़र आ रही है... पहले कुछ लोग ही हमला कर देने की बात करते थे, और कुछ का कहना होता था - 'ऐसा मुमकिन नहीं है, क्योंकि किसी मुल्क पर हमला करना आसान नहीं होता...' या 'आप क्या समझते हैं, अमेरिका की तरह आप भी किसी मुल्क पर हमला कर सकते हैं...' या 'अगर हिन्दुस्तान ने पाकिस्तान पर हमला किया तो दुनिया के बहुत-से मुल्क हमारे ख़िलाफ़ हो जाएंगे...' या 'पाकिस्तान पर हमला कर देने की सूरत में वह भी चुपचाप नहीं बैठेगा, क्योंकि उसके पास भी हर तरह की लड़ाई के लिए पर्याप्त हथियार मौजूद हैं, और हिन्दुस्तान का भी इस लड़ाई से काफ़ी नुकसान होगा...'

इस तरह की बहुत-सी बातों के बीच जनता के एक तबके की आवाज़ दबकर रह जाती रही है, और पाकिस्तान से हिसाब कभी चुकता नहीं हो पाया... या यूं कहिए, पाकिस्तान को कभी इस बात के लिए सबक नहीं सिखाया जा सका, कि सहिष्णु कहे जाने वाले हिन्दुस्तान पर हमला कर देने का अंजाम क्या हो सकता है, और 'पहले हमला नहीं' के सिद्धांत का पालन करने वाले हिन्दुस्तान के शांत रहने को उसकी कमज़ोरी न समझे पाकिस्तान...

लेकिन इस बार माहौल कुछ अलग महसूस हो रहा है... इस बार आम जनता ही नहीं, बड़े पदों पर विराजमान, और पढ़े-लिखे तबके के लोग भी कुछ ऐसी ही बातें कर रहे हैं... हमें याद है कि प्रधानमन्त्री की गद्दी पर बैठे व्यक्ति का हमेशा ऐसा बयान आता रहा है, जिसमें हमले से बचने की बातें कही जाती रही हैं... अन्य राजनेताओं के बयानों में भी कहीं न कहीं नाम लेने से बचने का एहसास होता रहा है...

लेकिन इस बार प्रधानमन्त्री ने कहा, 'विश्व समुदाय को सुनिश्चित करना चाहिए कि पाकिस्तान में आतंकवाद का आधारभूत ढांचा पूरी तरह हमेशा के लिए ध्वस्त कर दिया जाए। भारत आतंकवाद के बारे में पाकिस्तान के वायदों पर यकीन नहीं करेगा तथा हम विश्व समुदाय के साथ मिलकर सुनिश्चित करेंगे कि कथनी को करनी में बदला जाए।' इस बयान में पहले के बयानों की तरह टालमटोल वाली भाषा की गैर-मौजूदगी बहुत उत्साह देने वाली है... इसके अलावा विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भी कहा कि 'आतंकवाद के खिलाफ सरकार कोई भी ठोस कदम उठाती है तो विपक्ष हर हाल में सरकार का साथ देगा...' इन दो बड़े नेताओं के अलावा भी एक और बेहद पढ़े-लिखे और अनुभवी नेता, जो पत्रकार भी रहे हैं, अरुण शौरी ने भी भाषा में बदलाव लाते हुए कहा, 'एक आंख के बदले दोनों आंखें और एक दांत के बदले पूरा जबाड़ा ले लेने का वक्त आ गया है...' जनता के एक बहुत बड़े हिस्से के मुताबिक 'किसी न किसी दिन देश का प्रधानमन्त्री बनने' के लिए राजनीति में उतरे राहुल गांधी ने भी कहा, 'आतंकवादियों को हर भारतीय के प्राणों की कीमत का एहसास दिलाना होगा...'

खैर, राजनेताओं के बयान हमेशा ही जोशीले होते हैं, लेकिन याद रखिए, हर तरफ़ से एक ही तरह के, यानि बदला लेने की भाषा में बात करने वाले, बयान पहले दुर्लभ रहे हैं... इसके अलावा जनता के हर तबके में ऐसे लोगों की तादाद भी इस बार कम ही महसूस हो रही है, जो हमले से बचने की सलाह दिया करते थे...

हमले के बाद भी ज़िंदगी की रफ़्तार जारी है... दफ्तर, घर, मोहल्ले, बाजारों, पान की दुकानों और सडकों पर पहले ही की तरह हर व्यक्ति बातचीत करता है... लेकिन इस बार नया यह है कि हर जगह 'हमला' शब्द पहले से कहीं ज़्यादा सुनाई दे रहा है... जब कहीं सर्वेक्षण किए जाते हैं, तब भी तो कुछ लोगों से बात करके उसी में से प्रतिशत का हिसाब लगाकर नतीजे को जनता की राय बताया जाता है... सो, अगर उन्हीं मानकों से देखें तो इस बार अधिकतर हिन्दुस्तानी चाहते हैं, कि पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए उस पर हमला ज़रूरी है...

बहरहाल, जनता के गुस्से को दरकिनार कर हमले की बात न भी करें, तो पाकिस्तान को इस बात के लिए मजबूर किया जाना अब अनिवार्य हो गया है कि वह अपनी धरती का इस्तेमाल कर रहे भारत के अपराधियों को पकड़ने के लिए हिन्दुस्तान का साथ दे... हिन्दुस्तान के फौजियों को पाकिस्तान की धरती पर जाकर कार्रवाई करने की इजाज़त मिले, और वे उनको पकड़ने या नेस्तोनाबूद करने के लिए तैयार होकर जाएं... और हां, ऐसा भी महसूस हो रहा है कि इस मांग के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन भी आज के माहौल में जुटाना पहले की तरह मुश्किल नहीं होगा... लेकिन अगर पाकिस्तान इसके लिए राजी नहीं होता है, तो भी हिन्दुस्तान को इस बार खामोश नहीं बैठे रहना होगा...

याद रहे - अगर एक हमले के बाद अमेरिका अपने सबूतों के आधार पर अफगानिस्तान पर हमला कर देने और उसको कब्जा लेने का हक रखता है तो हिन्दुस्तान की धरती पर भी वैसे ही जियाले जन्म लेते हैं, और देश को सुरक्षित रखने का जज़्बा भी उनमें अमेरिका के नागरिकों से कम नहीं है...

हम मानते हैं कि परेशानियां होंगी, या यूं कहिए परेशानियां बढ़ेंगी पाकिस्तान पर हमला कर देने से, खतरा भी बेहद बढ़ जाएगा... लेकिन बातचीत या शान्ति-वार्ता से पाकिस्तान के कान पर जूं भी नहीं रेंगती है - इसका कितनी बार और सबूत चाहते हैं हम... कब तक बातचीत का राग अलापते रहेंगे हम... कब जागेगा इंडिया, एक नई सुबह में, जिसमें आतंकवाद से इस तरह नहीं डरना पड़ेगा...

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Monday, December 1, 2008

कसूरवार हम हैं, अच्युतानंदन नहीं...

शर्मिन्दगी महसूस हो रही है... क्या हमें वास्तव में अच्युतानंदन जैसे नेताओं की ज़रूरत है... क्या हमने वास्तव में अच्युतानंदन जैसे नेता पाने के लिए लोकतंत्र की व्यवस्था के बीच वोट दिया था... क्या अच्युतानंदन जैसे लोगों के नेता बन जाने में हम कहीं भी दोषी नहीं हैं... क्यों अच्युतानंदन जैसे नेताओं को बर्दाश्त करते रहना हमारी मजबूरी है...

एक आतंकवादी हमले के दौरान मुल्क की आन, बान और शान के साथ-साथ जनसाधारण की जान का बचाव करते हुए एक जांबाज़ जान से गया... आप उसके घर पर 'तथाकथित' रूप से श्रद्धांजलि अर्पित करने जाते हैं... वहां दुःख और गुस्से में भरे उसके पिता ने आपसे कुछ कहा, और शायद घर में प्रवेश नहीं करने दिया... आप बिफ़र जाते हैं, और बयान देते हैं - अगर वह शहीद मेजर का घर नहीं होता, तो वहां कोई कुत्ता भी नहीं जाता...

याद रखिएगा अच्युतानंदन जी, जिस घर को आप कुत्तों के जाने योग्य भी नहीं समझते, उसी घर के बेटे ने अपनी जान देकर देश की रक्षा की... शर्म आ जाती है, कि हमने न सिर्फ़ ऐसे व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि चुना है, बल्कि ऐसे और भी लोगों को प्रतिनिधि के रूप में विधानसभा भेजा, जिन्होंने अच्युतानंदन जैसे शिष्टाचार से कोरे, शहादत का सम्मान करने में अक्षम व्यक्ति को सदन का नेता चुनकर हमारे सिर पर मुख्यमंत्री बनाकर बिठा दिया... यकीन मानिए, अच्युतानंदन से ज़्यादा यह हमारे लिए शर्मिंदा होने की बात है...

मैं अच्युतानंदन जी से सिर्फ़ एक सवाल करना चाहता हूं... आदरणीय मुख्यमंत्री जी, एक बार ठंडे दिमाग से सोचकर बताइएगा, मेजर के पिता ने आपके साथ ही ऐसा व्यवहार क्यों किया... अगर आप मुख्यमंत्री न होकर कोई साधारण व्यक्ति होते, तो शेष लोगों की ही तरह आपको भी उनके घर में प्रवेश मिला होता, और यह सब अवांछनीय घटित नहीं होता...

इस सवाल का जवाब है... जनता के प्रति आपकी निर्लिप्तता, जिसके कारण आप कभी आम लोगों को 'अपने' लगे ही नहीं... जनता के दिल में आपके प्रति गुस्सा, जिसकी जड़ में है कमज़ोर राजनैतिक व्यवस्था, जो संदीप जैसे जांबाज़ों की शहादत की वजह बनी... लेकिन आपके मुताबिक अगर ऐसा नहीं है तो हमारे कुछ सवालों के जवाब दीजिए...

- क्यों आप सारे काम छोड़कर पहले ही दिन मेजर संदीप के घर पर नहीं पहुंचे...?
- क्यों आप मेजर के पिता के दिल में मौजूद गुस्से को बर्दाश्त नहीं कर सके...?
- आपकी प्रतिक्रिया, जिसे दोहराते हुए भी शर्म आती है, को देखते हुए क्या आप अब भी कह सकेंगे कि आप श्रद्धांजलि अर्पित करने संदीप के घर गए थे, सिर्फ टीवी पर अपना चेहरा दिखाने नहीं...

खैर, अच्युतानंदन जी... इस वक्त आपके अलावा भी बहुत-से ऐसे नेता हैं, जो सिर्फ़ राजनीति चमकाने के लिए इस दारुण मौके का इस्तेमाल कर रहे हैं, और अफ़सोसनाक़ यह है कि कोई भी राजनैतिक दल ऐसे नेताओं के बिना अस्तित्व में नहीं है... अब उन्हें अपना प्रतिनिधि बना बैठने के लिए हमें ख़ुद को ही दोषी मानकर आगे के लिए रणनीति तैयार करनी होगी... सोचना होगा, कि क्या हम ऐसे ही नेताओं के भरोसे ख़ुद को छोड़कर चिंता-मुक्त हो पाएंगे...

और हां, एक आखिरी नसीहत अच्युतानंदन जी के लिए... आपका कहना है कि अगर वह शहीद का घर नहीं होता तो वहां कोई कुत्ता भी नहीं जाता, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर आप मुख्यमंत्री नहीं होते, तो संदीप के घर पर आपके साथ ऐसा व्यवहार होता, जो लिखा भी न जा सके...

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